झारखंड: पलामू के बृजमोहन राम बने ओडिशा के राज्यपाल, झारखंड में खुशी की लहर
रांची – झारखंड के पलामू जिले से ताल्लुक रखने वाले वरिष्ठ नेता बृजमोहन राम को ओडिशा का राज्यपाल नियुक्त किया गया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की ओर से छह राज्यों में राज्यपालों की नियुक्ति के फैसले के तहत उन्हें यह अहम जिम्मेदारी सौंपी गई। उनकी नियुक्ति की खबर सामने आने के बाद पलामू सहित पूरे झारखंड में खुशी का माहौल है। स्थानीय लोगों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने इसे राज्य के लिए सम्मान और गौरव का विषय बताया है।
बृजमोहन राम की नियुक्ति के साथ ही पलामू एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गया है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के टिकट पर तीन बार सांसद रह चुके बृजमोहन राम का राजनीतिक अनुभव उनकी नई जिम्मेदारी के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। क्षेत्र के लोगों को उम्मीद है कि उनके राज्यपाल बनने से झारखंड और ओडिशा के बीच आपसी सहयोग तथा संबंधों को बढ़ावा मिल सकता है।
राष्ट्रपति की ओर से की गई नियुक्तियों के बाद बीजेपी के भीतर भी उत्साह देखा जा रहा है। वहीं, राजनीतिक विश्लेषक इस फैसले को केवल प्रशासनिक नियुक्ति तक सीमित न मानकर इसके व्यापक राजनीतिक प्रभावों पर भी चर्चा कर रहे हैं। खासकर पलामू प्रमंडल में अनुसूचित जाति (एससी) समुदाय के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व के संदर्भ में इस घटनाक्रम को अहम माना जा रहा है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बीजेपी की इस नियुक्ति के पीछे आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए सामाजिक समीकरणों को साधने की रणनीति भी हो सकती है। मिशन 2029 के मद्देनजर पलामू जैसे क्षेत्रों में पार्टी की राजनीतिक स्थिति मजबूत करने के प्रयासों के रूप में भी इसे देखा जा रहा है। हालांकि, नियुक्ति के पीछे किसी विशेष राजनीतिक रणनीति की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
दूसरी ओर, झारखंड की राजनीति में झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) की ओर से भी पलामू प्रमंडल के नेताओं को महत्वपूर्ण अवसर दिए जाने का उदाहरण रहा है। लातेहार जिले के निवासी बैद्यनाथ राम को झामुमो राज्यसभा भेज चुका है। ऐसे में बृजमोहन राम को राज्यपाल बनाए जाने के बाद क्षेत्र में अनुसूचित जाति समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
कुल मिलाकर, बृजमोहन राम की नियुक्ति को झारखंड, खासकर पलामू क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है। जहां एक ओर उनकी नई संवैधानिक भूमिका को लेकर लोगों में उत्साह है, वहीं दूसरी ओर इस फैसले के सामाजिक और राजनीतिक प्रभावों पर भी नजर रखी जा रही है।
